क्यों गया जी को पितरों की मुक्ति का सबसे पावन तीर्थ माना जाता है
हिन्दू पंचांग के अनुसार भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) कहा जाता है। मान्यता है कि इन दिनों पितृ लोक से हमारे पूर्वज धरती पर आते हैं और अपने वंशजों से श्राद्ध, तर्पण व पिंड दान की अपेक्षा रखते हैं।
पितृ पक्ष में किया गया श्राद्ध कर्म पितरों को तृप्त कर परिवार में सुख-समृद्धि, संतान सुख व स्वास्थ्य लाभ प्रदान करता है, ऐसी शास्त्रों में मान्यता है। प्रत्येक वर्ष पितृ पक्ष की सटीक तिथियां पंचांग के अनुसार बदलती हैं - वर्तमान वर्ष की सही तिथियों की जानकारी हेतु कृपया हमसे फोन या व्हाट्सएप पर संपर्क करें।
पौराणिक कथा के अनुसार गयासुर नामक अत्यंत पवित्र दैत्य को भगवान विष्णु ने वरदान दिया था कि जो कोई भी उसके शरीर रूपी इस भूमि (गया) पर श्राद्ध कर्म व पिंड दान करेगा, उसके पितरों को अवश्य मोक्ष की प्राप्ति होगी। इसी कारण गया जी को धरती की सबसे पावन "मोक्ष-भूमि" माना जाता है, तथा यहाँ किया गया पिंड दान अन्य किसी भी तीर्थ स्थान से अधिक फलदायी माना जाता है।
विष्णुपद मंदिर में भगवान विष्णु के चरणचिह्न, फल्गु नदी का पावन तट तथा निकट स्थित अक्षयवट वृक्ष - ये तीनों गया श्राद्ध के प्रमुख स्थल हैं। फल्गु नदी में जल कम या न होने पर भी इसे तीर्थ माना जाता है, और अक्षयवट के नीचे किया गया पिंड दान "अक्षय" अर्थात कभी क्षीण न होने वाला फल देने वाला माना जाता है।
पिंड दान वर्ष भर किसी भी दिन किया जा सकता है, परंतु पितृ पक्ष के 16 दिनों में इसका विशेष महत्व माना जाता है, इसलिए इन दिनों गया जी में यजमानों की संख्या भी अधिक रहती है। यदि आप शांतिपूर्ण वातावरण में विधि सम्पन्न करवाना चाहते हैं तो पितृ पक्ष के अतिरिक्त किसी भी माह में आना भी उतना ही शास्त्रसम्मत है। आने से पूर्व हमें अवश्य संपर्क करें ताकि तिथि, ठहरने व पूजन सामग्री की व्यवस्था पहले से सुनिश्चित हो सके।
वेद-पुराणों के अनुसार सम्पूर्ण कर्मकांड प्रामाणिक विधि से।
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